Monday, 6 December 2010

करोड़ों रुपये की जालसाजी में फंसा एनडीटीवी

ICICI की मिलीभगत से कौड़‍ियों के शेयर सैकड़ों में बेचे, देश के बाहर हुआ सारा खेल
♦ विनीत कुमार
2Gस्पेक्ट्रम मामले में अपनी तेज तर्रार पत्रकार पर आरोपों के छींटे पड़ने से जो सदमा एनडीटीवी प्रबंधन को लगा था, उससे उबरने की सूरत तलाशी ही जा रही थी कि करोड़ों रुपये की जालसाजी के आरोपों ने प्रबंधन को नये सिरे से सकते में डाल दिया है। द संडे गार्जियन नाम के अखबार की साइट ने, जिसे कि इसी साल के जनवरी महीने (31 जनवरी 2010) में 3 रुपये की कीमत के साथ एमजे अकबर ने लांच किया, खबर दी है कि एनडीटीवी ने इस देश को करोड़ों रुपये का चूना लगाने का काम किया है। द संडे गार्जियन इस खबर को लगातार फॉलो कर रहा है और 6 दिसंबर तक इसकी ऑफिशियल साइट ने कुल तीन रिपोर्टें प्रकाशित की हैं। पहली बार 4 दिसंबर को साइट ने NDTV-ICICI loan chicanery saved Roys नाम से पहली रिपोर्ट प्रकाशित की और उसमें बताया कि कैसे उसे ICICI बैंक ने गलत तरीके से कर्ज दिये। इस खबर में ये भी बताया कि किस तरह से मनोरंजन चैनल (GEC) एनडीटीवी इमैजिन, जिसे कि अब TURNER GENERAL ENTERTAINMENT NETWORKS INDIA PRIVATE LIMITED के हाथों बेच दिया गया है, उसके शेयर की फेस वैल्यू यानी बाजार मूल्य 10 रुपये थे, उसे 776 रुपये में बेचे गये और ये सारा खेल देश के बाहर हुआ। भारत में जो निवेशक थे, जो कि यहां की कंपनी में थे, उन तक ये लाभ नहीं पहुंचा। रिपोर्ट ने बताया कि एनडीटीवी लगातार विदेशों में शेयरों की खरीद-बिक्री, कर्ज लेने का काम करता रहा है और ऐसी दरों पर शेयरों की खरीद-बिक्री की है, जिसका कि वास्तविक मूल्य से कोई तालमेल नहीं रहा है। इधर भारतीय बाजार में देखें, तो एनडीटीवी के शेयर लगातार तेजी से लुढ़कते रहे हैं। जाहिर सी बात है कि एनडीटीवी के जिंदा रहने के पीछे मूल रूप से विदेशों से हो रहे शेयरों की खरीद-बिक्री और लेन-देन रहे हैं।
ICICI बैंक से गलत तरीके से कर्ज लेने के मामले में रिपोर्ट में कहा गया है कि ये डील जुलाई और अक्टूबर 2008 के बीच हुई, जब एनडीटीवी ने अपने शेयर वापस खरीदने चाहे। तब एनडीटीवी के शेयर की कीमत 439 यानी वूम पर थी और उसे लग रहा था कि इसकी कीमत और बढ़ सकती है। लिहाजा एनडीटीवी ने चाहा कि वो अपने शेयर वापस खरीदे लेकिन उसके पास लिक्विड फंड नहीं था। तब उसने कुल 90,70,297 शेयर के बदले India Bulls Financial Services से 363 करोड़ रुपये उधार लिये। ये जुलाई 2008 की बात है। अगस्त 2008 में शेयर मार्केट बुरी तरह कोलैप्स कर गया। अमेरिका की वजह से पूरी दुनिया में शेयर बाजार की मिट्टी पलीद हो गयी। ऐसे में इंडिया बुल्स के पास गिरवी के तौर पर जो शेयर रखे गये थे, उसकी कीमत गिरकर 100 रुपये प्रति शेयर हो गया। इंडिया बुल्स ने अपने दिये हुए लोन की बात दोहरायी और कंपनी से पैसे की मांग की। एनडीटीवी के पास इतने पैसे कहां थे, जो कि वो इंडिया बुल को चुका पाता। लिहाजा उसने ICICI बैंक का हाथ थामा और बैंक ने अक्टूबर महीने में कुल 375 करोड़ रुपये एनडीटीवी को दिये। बदले में एनडीटीवी ने कुल 47,41,721 शेयर बैंक के पास गिरवी के तौर पर रखे, जिसकी औसत कीमत 439 रुपये लगायी गयी, जो कि लगभग 208 करोड़ रुपये होती है।
ये पहली बार था कि इस तरह से लगभग आधी रकम के शेयर के बदले इतनी रकम लोन के तौर पर दी गयी। द संडे गार्जियन का कहना है कि इसे वित्तीय जालसाजी न कहा जाए, तो और क्या कहा जाए। इतना ही नहीं, जिस समय एक शेयर की कीमत 439 रुपये लगायी गयी, उस समय (23 अक्टूबर 2008) बाजारू कीमत मात्र 99 रुपये थी। इस तरह शेयर की राशि बनती थी मात्र 46.94 करोड़ रुपये। इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्‍प पहलू है कि एनडीटीवी के जो भी शेयर इंडिया बुल्स को दिये गये, फिर बाद में ICICI बैंक को दिये गये, वो सबके सब RRPR Holding Private Limited के जिम्मे थे। ये वही कंपनी थी, जिसमें बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में दो ही लोग थे – मिस्टर रॉय और मिसेज रॉय। जुलाई 2008 के पहले इस कंपनी ने एनडीटीवी के एक भी शेयर नहीं खरीदे। मामले में एक और दिलचस्प पहलू है कि इंडिया बुल्स के भुगतान किये जाने के बाद RRRR के एक बोर्ड डायरेक्टर को 73.91 करोड़ रुपये बिना किसी ब्याज के लोन दिये गये। ये वही पैसे थे, जो ICICI बैंक से कर्ज के तौर पर लिये गये और जो SARFAESI Act 2002 का सीधा-सीधा उल्लंघन था।
इस मामले में चौंकानेवाली बात है कि मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को इन सारी सूचनाओं की जानकारी मिलती रही, लेकिन वे चुप रहे। एक बड़ा सवाल है कि बैंक ने इतनी आसानी से क्यों कर्ज दे दिया? द संडे गार्जियन का कहना है कि जब पिछले ही महीने 2000 करोड़ रुपये के लोन घोटाले में सीबीआई ने LIC और दूसरे बैंकों के आठ सीनियर मैनेजरों को गिरफ्तार किया, तो फिर क्या ये मामला उससे अलग है?
द संडे गार्जियन ने अपनी दूसरी रिपोर्ट जो कि 5 दिसंबर को प्रकाशित हुई है – NDTV juggles funds, shares abroad, avoids tax, उसमें बताया है कि NDTV किस तरह से फंड को लेकर चालबाजी करता आया है, विदेशों में शेयरों के लेन-देन करके भारत में अपने को टैक्स से बचाता है। इस रिपोर्ट में साइट ने एनडीटीवी के एक के बाद एक चैनल के खोलने और फिर उसके धड़ाधड़ हिस्सेदारी बेचने के पीछे की कहानी को विस्तार से बताया है। अपने विदेशी सहायक चैनलों और वेंचरों के माध्यम से कैसे उसने भारतीय टैक्स और कार्पोरेट कानून का उल्लंघन किया है, इसकी पूरी कहानी रिपोर्ट में दी गयी है? नवंबर 2006 में NDTV Network Plc, UK को स्थापित किया गया, जिसकी बैलेंस शीट भारत में फाइल नहीं की गयी। इस कंपनी ने बहुत पैसे अर्जित किये और NDTV Imagine (जो कि अब बिक गया), NDTV Lifestyle, NDTV Labs, NDTV Convergence और NGEN Media में बहुत पैसे लगाये भी। अधिकांश डील एनडीटीवी के नाम से हुए लेकिन एक भी पैसा भारत में टैक्स के तौर पर नहीं आया। एनडीटीवी इंडिया ग्रुप ने अप्रैल 2008 के दौरान 804.6 करोड़ रुपये उगाहे, जो कि सितंबर 2009 तक आते-आते 982.2 करोड़ रुपये हो गये। एनडीटीवी ने ये पैसे अपने विदेशी स्रोतों से अर्जित किये, जो कि यूके और नीदरलैंड में उसके सहयोगी चैनलों और वेंचरों की बदौलत आये थे। इस तरह भारत में एनडीटीवी के साथ इसकी बैलेंस शीट नहीं अटैच की गयी, तो दूसरी तरफ विदेशों में जो इसके सहयोगी वेंचर हुए, उसमें विस्तार से सब कुछ नहीं बताया गया। यहां तक कि यूके NDTV Network Plc में जो कंपनी खोली गयी, उसका अपना कोई कर्मचारी भी नहीं था। जो था वो एक ही साथ कई कंपनियों का भी काम संभालता था। एनडीटीवी ने नीदरलैंड में वेंचर मजबूत करने के लिए यूके के वेंचर का इस्तेमाल किया। यूके के वेंचर को मजबूती देने के लिए नीदरलैंड के वेंचर का इस्तेमाल किया और इस तरह एक-दूसरे के सपोर्ट से काम चलता रहा। लेकिन भारत में जो इसकी बैलेंस शीट थी, उसमें यह सब दर्ज नहीं था जबकि देखा जाए तो ये भारत की एनडीटीवी के ही सहयोगी वेंचर थे। इनमें से कइयों की साइट खोलने पर डीटेल के बजाय यही आता कि यह भारत की एनडीटीवी की सहयोगी कंपनियां हैं।
रिपोर्ट ने विस्तार से बताया कि कैसे देश के बाहर इसके वेंचर को मजबूती मिलती रही, जबकि यहां इसके शेयरधारकों को इसका कोई लाभ नहीं मिला क्योंकि जिस वेंचर को लाभ पहुंचते, उसका यहां जिक्र नहीं होता।
चार दिसंबर को ही साइट ने NDTV CEO gives reply, Guardian responds शीर्षक से एक और रिपोर्ट छापी है, जिसमें कि उसने एनडीटीवी से एक बेहतर पत्रकारिता की संभावना बनी रहे, इसलिए नौ सवालों के जवाब मांगे गये। एनडीटीवी के सीईओ ने द संडे गार्जियन की इस खबर को निराधार और फर्जी करार दिया और साथ में यह भी कहा कि पब्लिकेशन और व्यक्तिगत स्तर पर सिविल और क्रिमिनल दोनों कानूनों के तहत अदालती कार्रवाई की जाएगी। साइट ने एनडीटीवी के सीईओ केएल नारायण राव के जवाब को भी प्रकाशित किया है और उसके आगे लिखा है कि उन्होंने गोलमोल तरीके से जवाब दिया है।
30 नवंबर 2010 को जब बरखा दत्त NDTV 24X7 के कठघरे में एडिटर्स के सवालों के जवाब दे रही थीं, तो एंकर सोनिया सिंह ने कहा था कि संभव हो ये पूरा मामला कार्पोरेट वार का हिस्सा हो। वर्चुअल स्पेस पर जनतंत्र डॉट कॉम ने भी इसे इसी तरह से विस्तार देने की कोशिश की है और मीडिया के लोगों के नाम आने को बहुत ही छोटा खेल बताया जा रहा है। उसमें इस बात की आशंका जतायी गयी है कि संभव है कि ओपन और आउटलुक जैसी पत्रिका भी सत्ता की दलाली के लिए ये सब कर रहे हों, इस सवाल में एक सच्चाई यहां आकर जुड़ती है कि क्या द संडे गार्जियन भी कुछ ऐसा ही कर रहा है? जनवरी में शुरू हुए इस अखबार ने एनडीटीवी के 2007-08 की डील और बिजनेस का ब्योरा अब जाकर देते हुए सारी बातें सामने लायी हैं। बैलेंस शीट भी प्रकाशित किया है। अगर ऐसा है, तो कार्पोरेट वार के साथ-साथ मीडिया वार भी शुरू हो चुका है।
एमजे अकबर इन दिनों इंडिया टुडे ग्रुप में हैं। इससे पहले महीने भर के लिए इंडिया न्यूज को सेवा देकर आये हैं। प्रेस क्लब में राजदीप सरदेसाई, द संडे इंडियन में अरिंदम चौधरी के आरोपी पत्रकारों के बचाव में उतर आने और नीरा राडिया से पत्रकारों की बातचीत के टेप आने के करीब तीन सप्ताह बाद दैनिक भास्कर में 6 दिसंबर को दो पन्ने में एक्सक्लूसिव खबर छपने की घटना से अंदाजा लगाना चाहिए कि अब मीडिया वार शुरू हो गया है। ये मीडिया वार अब खबरों की दुनिया से आगे निकलकर एक-दूसरे को पूरी तरह तहस-नहस कर देने की नीयत से शुरू हुआ है। इसके पीछे की लीला शायद यह भी हो कि ऐसी स्थिति कर दी जाए कि इस देश में बिग पिक्चर, बिग सिनेमा, बिग टीवी के साथ-साथ सिर्फ बिग मीडिया रहे, बिग खबरें रहे, दूसरा कोई नहीं। इन सबों पर गंभीरता से सोचने की जरुरत है। हालांकि द संडे गार्जियन की इस खबर पर कई ऐसे कमेंट आये हैं, जो इस खबर को बकवास बताते हैं लेकिन अगर ये खबर सच है तो समझिए कि हमारे सामने कितना बड़ा आदर्श ध्वस्त होता नजर आ रहा है?

Sunday, 14 November 2010

आजतक चैनल को राम के पुरुषत्व पर शक है


आज की महिला को राम जैसा पति नहीं चाहिए। उसे थोड़ा बैड व्ऑय चाहिए। महिलाएं हो गयी और 'बोल्ड' नाम से अपने खास कार्यक्रम में एंकर ने साफ तौर पर कहा कि अब महिलाओं को राम जैसा पति नहीं चाहिए। फेसबुक पर जब मैंने इस लाइन को साझा किया तो 'हंस' पत्रिका में जेंडर जिहाद नाम से नियमित स्तंभ लिखनेवाली स्त्री मामलों की युवा विमर्शकार शीबा असलम फहमी ने सीधा सवाल किया कि- आप भी विनीत! क्या रामजी उस मामले में कमजोर थे जो अब नहीं चाहिए?

भारतीयता, संस्कृति और काफी हद तक हिन्दुत्व के नाम पर अपनी दूकान चलानेवाले आजतक चैनल को इस बात का अंदाजा क्यों नहीं है कि इस देश की करोड़ों जनता अगर राम को अपना आदर्श मान रही है तो उस आदर्श होने  में उनकी सेक्सुअल कैपिसिटी भी शामिल है। वैसे भी इस देश में तो आदर्श वही पुरुष हो सकता है जो कि संतान पैदा करने की क्षमता रखता हो। यहां तो सेक्स को लेकर पूरी अवधारणा ही इस आधार पर विकसित हुई है कि संभोग का परिणति संतान में होना अनिवार्य है,यह सिर्फ आनंद के लिए नहीं है। ये जार्ज लूकाच की अवधारणा तो है नहीं कि सेक्स का पहला काम प्लेजर है,आनंद है। कोई जरुरी नहीं कि इसे संतान पैदा करने के लिेए ही किया जाए। संभवतः यही वजह है कि यहां लोग सेक्स करने पर अगर संतान पैदा करने की बात नहीं सोचते तो अपराध करने जैसा करार दिए जाते हैं। इसे दूसरी तरह से कहें तो जो संतान पैदा करने की क्षमता नहीं रखता,उसे जीने तक का अधिकार नहीं है। अभी दो दिन से आपलोगों ने इसी चैनल पर देखा न कि राखी ने एक पुरुष को जब नामर्द कहा और वो भी एक बार तो इस चैनल ने उसे लूप करके कई बार चलाया और कहा कि उसने नामर्द कहे जाने पर सदमा झेल नहीं पाया और आत्महत्या कर ली। अब महिलाओं को राम जैसा पति नहीं चाहिए,आजतक के ऐसा कहने का क्या मतलब है?

मामला साफ है कि जो देश राम के नाम पर मिनट भर में सुलग सकता है,वो इस देश के चिन्हों को तहस-नहस कर सकता है,वो किसी को जिंदा जला सकता है,आजतक जैसा चैनल अगर उसके पुरुषत्व को लेकर सवाल खड़े करता है तो इसे किस रुप में लेगा? अब महिलाओं को राम की जगह बैड ब्ऑय चाहिए। राम के साथ ये जुमला जोड़कर चैनल क्या साबित करना चाहता है कि एक पुरुष या पति के तौर पर श्रीराम पत्नी के आगे आरती उतारने का काम करते होंगे और इसलिए वो अच्छे कहलाएं जिससे कि आज की स्त्रियों को परहेज है? आज की महिलाओं को बोल्ड और बिंदास दिखाने के फेर में आजतक चैनल ने कितनी बड़ी बात कही है,इसका अंदाजा जनता अगर रिएक्ट करना शुरु करती है तो उससे लग सकता है। तुकबंदी और जुमलेबाजी में महारथ हासिल करनेवाले इस चैनल को शायद इस बात की फीडबैक नहीं मिलती होगी कि उसके ब्रॉडकास्ट किए गए एक-एक शब्द को ऑडिएंस किस रुप में लेती है? हरियाणा के खाप पंचात के लिए चैनल की एडीटिंग मशीन की संतानों ने लगातार तालिबानी शब्द का प्रयोग किया। ये शब्द वहां के लोगों को इतना चोट कर गया कि मिर्चपुर में जब हमने बताया कि दिल्ली से आए हैं और पूछा कि पत्रकार हो तो करीब चार सौ लोगों ने हमें मिनट भर के अंदर घेर लिया और तन गया कि क्या हम तुम्हें तालिबानी दिखते हैं? इस तरह की खबरें प्रसारित करके चैनल कितने मीडियाकर्मियों की जान जोखिम में डालने का काम करता है,इसका आभास शायद उसे नहीं है।

आजतक चैनल ने सेक्स को लेकर सर्वे की यह सवारी इंडिया टुडे पत्रिका के ताजा अंक में सेक्स सर्वे पर चढकर की है जिसमें कहने को तो देश की महिलाओं को लेकर सर्वे किया गया है लेकिन वो दरअसल स्त्री और सेक्स से जुड़े उन चालू मसलों पर आधारित है जिसे कि मंडी में बेहतर तरीके से बेची जा सके। पिछले कई सालों से पत्रिकाओं की ओर से सेक्स को लेकर जो सर्वे होते आए हैं,उनकी प्रस्तुति और विजुअल्स साफ कर देते हैं कि ऐसे अंक निकालने की प्रेरणा उन्हें पोर्नोग्राफी पोर्टल,मैगजीनों से देखकर मिलती है। ये प्रिंट मीडिया में वही घिनौना खेल है जो कि चैनलों के लिए हरेक बुधवार के लिए किए जाते हैं। चैनल ने विजुअल्स के तौर पर सड़कों पर चलती, शॉपिंग करती, बात करती हुई लडकियों को दिखाया हैं। इन विजुअल्स से लड़कियों को लेकर जिस खुलेपन और आत्मविश्वास का बोध होता है वो बोल्ड शब्द के नजदीक का नहीं है। ये एक सामाजिक स्थिति है जबकि चैनल ने इसे सेक्स,पोर्नोग्राफी और बोल्ड मिलाकर एक करके दिखाने की कोशिश की है। एथिक्स के लिहाज से चैनल को इस बात का जबाब देना होगा कि उसने जिन लड़कियों को संदर्भ बदलकर दिखाने की कोशिश की क्या उन सबों की अनुमति उनके पास है?

हालांकि ये बात चैनल और पत्रिका के लिए भैंस के आगे बीन बजाने जैसा होगा लेकिन गौर करनेवाली बात तो है ही अगर स्त्री और सेक्स को लेकर सर्वे किए जाते हैं तो क्या ये सर्वे का हिस्सा नहीं है कि इस देश में कितनी लड़कियां चरित्र पर शक किए जाने की स्थिति में छोड़ दी जाती है,कितनी स्त्रियों से परस्त्री के साथ संबंध होने पर पुरुष दबाव बनाकर डिबोर्स लेने की बात करता है? कितनी स्त्रियों की जिंदगी पोस्ट मैरिटल अफेयर से तबाह होती है,कितनी स्त्रियों की जिंदगी टीन एज में ही उनसकी इच्छा के खिलाफ ही बर्बाद कर दी गयी? चैनल को इस बात का अधिकार नहीं है कि सेक्स और पोर्नोग्राफी को एक कर दे। इस देश में अगर सेक्स शिक्षा को लेकर अगर बबाल मचते हैं तो उसके पीछे कहीं न कहीं इस तरह की स्टोरी काम करती है जो कि सेक्स को लेकर अनिवार्य समझ औऱ पोर्नोग्राफी के बीच की स्थिति को ब्लर कर देते हैं। ऐसा किया जाना प्रोग्रेसिव एप्रोच को कुचल देना है।

स्क्रीन पर चटकारे लेकर और स्टोरी के हिसाब से ही लाल पोशाक में एंकर स्टोरी की शुरुआत करती है उससे साफ हो जाता है वो इस देश के कुंठा की शिकार ऑडिएंस को संबोधित कर रही है और इस क्रम में उसकी खुद की कुंठा जब-तब छलक जा रही है। वहीं पुरुष आवाज में जो वीओ कर रहा है उसका अंदाज ऐसा कि वो किसी अंग्रेजी पोर्नोग्राफी को देखते हुए उसका वर्णन अपने उन दोस्तों के लिए कर रहा है जो कि अंग्रेजी नहीं समझते और उन्हें हिन्दी तर्जुमा की जरुरत है। चैनल के लिे ये सब एक खेल और तान देने का हिस्साभर है लेकिन ये बात उसकी चिंता से बाहर है कि उसके ऐसा किए जाने से कुंठा में जी रहे समाज का नजरिया पहले से औऱ कितना मजबूत होता है? राम के सवाल पर और पोर्नोग्रापी और सेक्स के सवाल पर चैनल को जबाब देना भारी पड़ सकता है।

शीबा असलम फहमी का आजतक से सीधा सवाल-
AajTak Channel se poochha jana chahiye ki
1). Kya adarsh-Pati hona aur 'sexually competent Pati' hona alag baat hai?
2). Ye kaisa sawal hai ki Hum Bhartiye Nariyon ko Pati me kya chahiye, sex ya Ram?
3.) Kya adarsh-mard wahi jo Patni ka bhi Bhai ho?

4). Aur Sita ji ko agni pareeksha kya isliye deni padi ki wo unke khayal se sexually over-active thin? Kya un par bharosa nahi kiya ja sakta tha? Badi be-dhangi baten hain ye sab!
kul mila kar fayde ki chahat ne vigat 20 saalon me Sri Ram ka jitna dohan kiya hai ye uski ek misal hai. Pehle unhen ek War-cry ke Villain ki tarah pesh kiya, ab dayneey bana rahe hain.
Khair hame bhi samajhna hoga ki is charcha se bhi unki TRP na badh jae kahin aur we apne be-dhangepan se bhi na kamyab ho jaen


इस वेशर्म वीडियो के लिए चटकाएं-http://aajtak.intoday.in/videoplay.php/videos/view/43579/2/116/Jewel-of-women-now-is-no-shame.html

Thursday, 28 October 2010

गंध मचाने की जीवंत कथा उर्फ रजत शर्मा का करवाचौथ

करवा चौथ के नाम पर एकाध हिन्दी चैनलों को छोड़कर बाकियों ने जमकर गंध मचाये। चूंकि ऐसे मौके के लिए आजतक और इंडिया टीवी को महारथ हासिल है इसलिए उन पर इस त्यौहार का रंग कुछ ज्यादा ही गाढ़े तौर पर चढ़ा। टेलीविजन पर से ऐतिहासिक तथ्य तो गायब हो ही गए हैं,मौके की खासियत भी खत्म हो गयी है। जहां लिखा है प्यार,वहां लिख दो सड़क की तर्ज पर पूरी टेलीविजन इन्डस्ट्री बदहवाश काम किए जा रही है। ऐसे में पूरी कोशिशें इस बात की है कि कौन कितने ज्यादा वॉल्यूम में गंध मचा सकता है। कीचड़ में लीथ-लीथकर लोटने की आदत कोई मजबूरी नहीं बलिक शौक का हिस्सा बन गया है। लिहाजा करवा चौथ की कवरेज पर एक नजर-
 आजतक की दो एंकर सोलह सिंगार के अंदाज में स्क्रीन पर काबिज हुई और उसी अंदाज में एंकरिग किया। किस रंग के रत्न,जेवर पहनने से और कब पहनने से इस व्रत का सही आउटपुट मिलेगा,इसके लिए पेड पंडित को स्टूडियो में हायर किया। फिर एक के बाद एक पैकेज।
मसलन टेलीविजन की हस्तियों का करवाचौथ,बॉलीवुड की पत्नियों का करवाचौथ। फिर लगातार अपील आजतक छोड़कर कहीं मत जाइए,आपको चांद देखने के लिए बालकनी या छत पर नहीं जाना होगा,हम यहीं बताएंगे कि चांद निकला या नहीं,बस देखते रहिए आजतक। ऑडिएंस को अपने पर कितना भरोसा है,नहीं पता लेकिन चैनल को अपने उपर भरोसा रत्तीभर भी नहीं,इसलिए लगा कि इतनी मनुहार के बाद भी कहीं वो छिटक न जाए तो सीधे ऑफर किया- आजतक देखो,सोना जीतो।

कोई हिन्दी चैनल लाख कोशिशें कर लें,गंध मचाने के मामले में मैं इंडिया टीवी को सबका बाप मानता हूं। उसके आगे अब आजतक भी पायरेसी लगती है और आइबीएन7 इन दोनों चैनलों की कॉकटेल। इसलिए अगर आपको हिन्दी न्यूज चैनलों की गंध मचाई का मौलिक वर्जन देखना हो तो इंडिया टीवी के आगे कोई विकल्प नहीं।    इंडिया टीवी ने करवा चौथ को ईद के बराबर में लाकर खड़ा कर दिया। एक ही साथ स्क्रीन पर दस शहरों में कब,कहां चाद निकलेगा इसकी जानकारी देने में जुट गया और फिर शार्टकट में ही सही सभी जगहों का नजारा। पेड पंडित यहां भी बताने लग गए कि बस तीन मिनट बाकी है लखनउ में चांद निकलने में जबकि दिल्ली के लोग देख सकते हैं अभी चांद। इसके बाद वो सीधे खाने पर उतर गया।

किस राशि की महिला कौन सा आइटम खाकर अपना व्रत तोड़ेगी तो उसके दाम्पत्य जीवन के लिए बेहतर होगा और फिर एक-एक राशियों के हिसाब से उसकी चर्चा। ये अब एक कॉमन फार्मूला हो गया है खासकर इंडिया टीवी और आजतक के लिए कि चाहे सूर्यग्रहण हो,चाहे कोई व्रत हो सभी राशियों को लेकर एक पैकेज बना दो,पेड पंडित को बिठा लो। राशियों पर आधारित कार्यक्रमों की टीआरपी अच्छी होती है। एक सेलबुल एलीमेंट हैं।

अबकी बार टीआरपी के मैदान में सहारा ने न्यूज24 की कनपटी गरम कर दी है और उसे धकियाकर उसके आगे काबिज हो गया है। लिहाजा चैनल के भीतर कुछ अलग और डिफरेंट करने की जबरदस्त बेचैनी है जो कि चैनल के एंकरों सहित पैकेज में साफ तौर पर दिखाई देता है। लेकिन चैनल के भीतर एक भी दमदार प्रोड्यूसर नहीं है,इस सच को टेलीविजन देख रही ऑडिएंस भी बेहतर तरीके से समझती है। कायदे के एक-एक करके खिसक गए आजतक रिटर्न प्रोड्यूसर की कमी पैकेज को एक बेउडे मटीरियल की शक्ल में बदल देती है। वो आपको दिख जाएगा।..तो इसी डिफरेंट दिखने की बेचैनी ने उसे आज की सावित्री खोजने पर विवश किया। उसने स्पेशल पैकेज के तौर पर हॉस्पीटल की बेड पर पड़ी एक ऐसी महिला की स्टोरी दिखायी जो कि अपने पति के खराब लीवर की जानकारी के बाद अपने लीवर का पचास फीसदी हिस्सा देकर उसकी जान बचाती है। जाहिर तौर पर ये अच्छी और मानवीयता की बात है। ये मध्यवर्ग के बीच की गाथा है। लेकिन चैनल इस पैकेज को संभाल नहीं पाता है। डॉक्टर की बाइट और लगातार हॉस्पीटल के फुटेज, करवाचौथ के लाल और चटकीले रंगों के बीच सफेद,लाइट ब्लू रंग मनहुसियत पैदा करते हैं। नतीजा,लिजलिजे पैकेज और इस मनहूसियत से मन उखड़ जाता है जिसका फायदा सीधे तौर पर इंडिया टीवी उठाता है उसी स्टोरी को ज्यादा रोचक तरीके से पेश करता है। हां,सिेनेमा ने कैसे इस करवाचौथ को एक नेशन कल्चरल व्रत बनाया,करवाचौथ के एक दिन पहले की स्टोरी ज्यादा बेहतर और देखने लायक थी।

स्टार न्यूज पर बिहार चुनाव का सुरुर अभी भी सवार है लेकिन करवा चौथ भला उसके इस सुरुर से रुक तो नहीं जाएगा। लिहाजा वहां भी पैकेज चले। कुछ ऐतिहासिक तथ्यों तो कुछ फिल्मी हस्तियों की कहानी को जोड़ते हुए। लेकिन आजतक का मूवी मसाला इस मामले में बाजी मार गया। दीपिका कैसे अपने फिल्म प्रोमोशन-खेले हम जी जान से के लिए इस व्रत को भुनाती है,ढंग से बताया। मल्लिका को कैसे करवाचौथ के नाम पर सुरसुरी छूट जाती है और मातमी शक्ल में नजर आने लगती है,आजतक की इस खोजी पत्रकारिता( हंसिए मत प्लीज) के स्टार न्यूज फीका पड़ गया। हां,उसकी बॉल सबसे बेहतरीन और कलात्मक लगी

देशभर में जहां-जहां भी महिलाओं ने करवा चौथ मनाएं और मेंहदी से शुरु होनेवाले सोलह सिंगार किए,उनमें से एक भी सांवली या काली त्वचा वाली महिला ने या तो मेंहदी नहीं लगाए या फिर व्रत नहीं किया। न्यूज चैनलों की करवा चौथ कवरेज से मेरी तो यही समझ बनी। ये त्योहार सिर्फ गोरी महिलाओं के लिए है और गोरी कलाइयों पर ही मेंहदी का रंग चढ़ सकता है। पूरे टेलीविजन में मुझे सिर्फ नकुषा( लागी तुझसे लगन) ही ऐसी लड़की नजर आती है जिसे कि काली और कुरुप होते हुए भी सिंगार करने का अधिकार है,मेंहदी रचा सकती है।

करवाचौथ का एक एक्सटेंशन वेलेंटाइन डे के तौर पर ही हुआ है और संभव है कि आनेवाले समय में ये आइडिय लव फॉर लाइव डे के तौर पर इमर्ज कर जाए। इसलिए एक मजबूत स्टोरी बनती है जिसे कि चैनलों ने दिखाया कि कैसे अब पति भी अपनी पत्नी के लिए ये व्रत करते हैं और चैनलों ने उन पतियों को उस दिन का हीरो बना दिया जो कि पत्नी के साथ व्रत रखे हैं। दूसरा कि अब सिर्फ अच्छा पति के लिए नहीं,अच्छा पति मिलने की कामना के लिए भी व्रत रखा जाता है। चैनल इस कॉन्सेप्ट को विस्तार देते हैं और इस पर भी जमकर स्टोरी चली और जोड़े विदाउट मैरिज खोजे गए।

इस करवाचौथ में देशभर की महिलाओं ने सोलह सिंगार किए,लंहगें और चटकीले रंगों की साडियां पहनी। फैशन की मार में काले रंग की भी साडियों पहनी,अपशगुन का कोई लोचा नहीं रहा। धोनी ने भी पहली बार व्रत कर रही  अपनी पत्नी साक्षी के लिए सूरत से खासतौर पर साडियां खरीदीं लेकिन चैनलों ने उसे साड़ी या जोड़े में दिखाने के बजाय दो दिन पहले की गोवा बीच वाली अधनंगी दिखती फुटेज ही दिखाए। चैनल की कुंठा के आगे साक्षी करवा चौथ में भी सोलह सिंगार नहीं कर सकी,धोनी की लायी हुई साड़ी नहीं पहन सकी। इसका अफसोस है।
इस पूरे प्रकरण में मुझे अमिताभ बच्चन के घर के आगे ब्लू टीशर्ट पहनी आजतक की रिपोर्टर बहुत ही लाचार नजर आयी,उस पर तरस आया। देशभर की लड़कियां,महिलाएं उस्तवी माहौल में रंगी है,वो बाइट न मिल पाने की स्थिति में लाचार और पुअर बाइट बेगर के तौर पर दिखाई देती है। तमाम चैनलों पर एंकर को जिस अंदाज में पेश किया गया,उनके चेहरे पर प्रोफेशन के अलावे निजी जिंदगी की कामना( फ्राइड की भाषा में लिबिडो), ललचायी इरादे ंसाफ तौर पर झलक गए। कई व्ऑइस ओवर को सुनकर महसूस किया कि वो मानो कह रही हो- क्या हर लड़की की जिंदगी त्योहारों के लिए बस आवाज देने के लिए है,उसकी अपनी आवाज नहीं है।

चैनल की इस पूरी चिरकुटई को मीडिया आधारित साइट मीडियाखबर ने बेहतर तरीके से पकड़ा और कल्पना किया कि अगर चैनल के मालिक और बड़े पत्रकार नए फैशन के हिसाब से करवाचौथ करेंगे तो वो अपनी चंदा को देखकर क्या मांगेंगे,लिहाजा- रजत शर्मा का करवाचौथ।

Wednesday, 27 October 2010

लाइव इंडिया का रावण चैनल हेड सुधीर चौधरी

कल हमने आपसे अपील की थी कि मैंने तो स्टार न्यूज के भीतर रावण और चैनल के रावण मानसिकता से ड्राइव होने की बात लिख दी है। आप भी पहल करें,अच्छा रहेगा। ठीक उसी रात मीडिया फोकस साइट मीडियाखबर डॉट कॉम ने एक सीरिज शुरु की- न्यूज चैनलों के नौ रावण और उनलोगों की पूरी एक लिस्ट जारी है जो वाकई अलग-अलग खौपनाक कारनामे से मीडिया इन्डस्ट्री के रावण हैं। लिहाजा हम वहां से वो पोस्ट उधार लेकर आपसे साझा कर रहे हैं। ये बहुत ही मौजूं दौर है,जहां आकर मीडिया जिसे की लोकतंत्र का चौथा स्तंभ और बदलाव का नायक करार देते रहे,उसकी शक्ल एक विलेन के तौर पर बन गयी है। पहले पीपली लाइव और अब नॉक आउट देखकर हम इसे आसानी से समझ सकते हैं।


अगस्त तीस (2007) को दरियागंज के तुर्कमान गेट के इलाके में अचानक बवाल हुआ, तोड़-फोड़ आगजनी हुई और सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुँचाई गयी, आरोपी शिक्षिका उमा खुराना को सजा देने के लिए सच्चरित्र और ईमानदार लोगों की भारी भीड़ जमा हो गयी। आरोपी शिक्षिका के कपड़े फाड़े गए, बाल पकड़ कर घसीटा गया और पूरी कोशिश की गयी कि उसे जज जनता सजा-ए-मौत दे दे। उसे बचाने वाली पुलिस पर भी इन जजों का गुस्सा उतरा, पथराव हुआ और वह जिप्सी जला दी गयी जिसमें अन्य कई केसों की महत्वपूर्ण फाइलें भी थीं जिनको फिर से तैयार करना एक दुष्कर और अत्यंत खर्चीला कार्य होगा।
उमा खुराना पर स्कूल में सेक्स रैकेट चलाने का आरोप लगा. इन सारी घटनाओं का सूत्रधार चैनल ‘लाइव इंडिया’जो कुछ ही दिन पहले इस रूप में आया था तत्काल चर्चित हो गया। न्यूज़ चैनल ‘जनमत’ को न्यूज़ चैनल ‘लाइव इंडिया’ बनाने वाले उसके मालिक ‘मार्कंड अधिकारी' इस बात से खुश थे कि खबरिया चैनलों की भीड़ के बावजूद मात्र 20 दिनों में उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी। जनता सड़कों पर उतर गयी। एक तरह की क्रांति हो गयी। 50 साल पुराने विद्यालय के गेट में रस्सी बांध दी गयी। 1200 छात्राओं में से 80 छात्राओं ने विद्यालय का बहिष्कार कर दिया। तीसरी कक्षा तक की छात्राओं को अभिभावकों ने रोककर उमा खुराना रूपी राक्षसी से उनकी रक्षा कर ली। इस प्रकार लाइव इंडिया ने समाज के बड़े हिस्से को गर्त में गिरने से बचा लिया।
अब तस्वीर का दूसरा पहलू. लाइव इंडिया का यह स्टिंग फर्जी साबित हुआ. इस स्टिंग को करने वाला लाइव इंडिया के रिपोर्टर प्रकाश सिंह का यह फर्जीवाडा था . उमा खुराना के बारे में न्यायाधीश ने कहा कि उमा खुराना अपराधी नहीं अपराधियों की करतूत की शिकार हुई लगती हैं. अब लाइव इंडिया के चैनल हेड सुधीर चौधरी की इजाजत से चले स्टिंग ऑपरेशन की हकीकत सुनिए.
जांच – पड़ताल के बाद पता चला कि लाईव इंडिया के रिपोर्टर ने स्टिंग में जिस छात्रा को दिखाया था, वह नोएडा से निकलनेवाले एक साप्ताहिक समाचारपत्र निर्भीक प्रहरी की संवाददाता थी. पत्रकारिता में तेजी से ऊपर पहुंचने के लिए उसने प्रकाश सिंह के कहने पर यह सब किया. बिहार से दिल्ली पत्रकारिता करने आयी रश्मि सिंह वह लड़की बन गयी जिसे उमा खुराना किसी ग्राहक को सौंप रही हैं. पुलिस की जांच-पड़ताल में ये बात सामने आई कि यह सब एक छोटे व्यापारी वीरेन्द्र अरोड़ा का रचा गया षड़यंत्र था. पूर्वी दिल्ली में चिटफंड का छोटा-मोटा धंधा करनेवाले अरोड़ा ने शिक्षिका को पैसे उधार दिये थे. डेढ़ लाख की वसूली नहीं हो पा रही थी इसलिए उसे बदनाम करवाने के लिए वह स्टिंग करवाना चाहता था. उसने एक दो चैनलों के रिपोर्टरों से इस सिलसिले में बात की. इन्हीं में से एक प्रकाश सिंह था जो ऐसा करने के लिए तैयार हो गया. वह स्टिंग में कुछ ऐसा दिखाना था जिससे यह लगे कि उमा खुराना वैश्यावृत्ति के धंधे में शामिल हैं. कम से कम तीन चैनलों को इस पेशकश की जानकारी थी. प्रकाश सिंह तब आईबीएन-7 में था जब अरोड़ा ने उससे संपर्क किया था. दोनों ने मिलकर तय किया कि वे इस खबर पर काम करेंगे. प्रकाश सिंह भी रातों-रात स्टार पत्रकार बनने की हसरत पाले हुए था. उसने इसी दौरान रश्मि सिंह से भी बात की. और रश्मि सिंह भी अच्छी नौकरी की आस में तैयार हो गयी. इस तरह एक स्टिंग तैयार हो गया और उमा खुराना को पर्दे पर स्कूली छात्राओं से देह व्यापार करनेवाला साबित कर दिया गया।
यह खबर आईबीएन सेवेन के लैब में संपादित हुई. सीडी तैयार थी और पता नहीं क्यों उसे दिखाने से मना कर दिया गया. प्रकाश सिंह को लगा उसका सपना चकनाचूर होने जा रहा है. उसने चैनल छोड़ दिया. कारण शायद कुछ और भी रहे होंगे. लेकिन वह लाईव इंडिया में आ गया. उसको काम करते हुए महीनाभर भी नहीं बीता होगा कि यह खबर सबके सामने आ गयी. स्टिंग के टेप में कहीं वीरेन्द्र अरोड़ा फोन करके लड़की का इंतजाम करने को कह रहे हैं और उमा खुराना “करती हूं” जैसी कोई बात कहते हुए सुनाई पड़ती हैं.

इस फर्जी स्टिंग ऑपरेशन के भंडाफोड के बाद लाइव इंडिया की फजीहत हुई. चैनल पर एक महीने का  बैन लगा. फर्जी स्टिंग करने वाला रिपोर्टर प्रकाश सिंह गिरफ्तार हुआ. चारो तरफ चैनल की थू – थू हुई. लाइव इंडिया के साथ दूसरे समाचार चैनलों की भी थुक्कम – फजीहत हुई. मिला – जुलाकर ऐसा माहौल बन गया कि समाचार चैनलों में सारे ऐसे ही फर्जी स्टिंग ऑपरेशन होते हैं. टीवी न्यूज़ की विश्वसनीयता घेरे में आ गयी. लाइव इंडिया के चैनल हेड सुधीर चौधरी ने कहा कि प्रकाश सिंह ने चैनल को अँधेरे में रखा. एक अंग्रेजी वेबसाइट ने सुधीर चौधरी के इसी बयान को कोट करते हुए लिखा : Now Sudhir Chaudhary is saying that the reporter kept the channel in the dark. He had only recently left India TV to head Live India (formerly Janmat). What about the editorial skills of your editors. Poor Choudhary can't be expected to deliver better, after all, he is graduated from India TV school of journalism.

सुधीर चौधरी का ये बयान थोथी दलील से ज्यादा कुछ नहीं था .यदि सही – गलत कंटेंट के फर्क को समझने की आपकी समझ नहीं है तो फिर एक चैनल का नेतृत्व आप किस मुंह से करते हैं. क्या ऐसी दलील देते सुधीर चौधरी को शर्म नहीं आई. उमा खुराना को झूठे मामले में ही सही गलत सिद्ध किये जाने पर उसके बाल पकड़कर घसीटा गया तो क्या सुधीर चौधरी को भी बाल पकड़ कर क्यों नहीं घसीटा जाना चाहिए?ऐसे व्यक्ति और चैनल को हम रावण न कहे तो क्या कहें?


कहने को सुधीर चौधरी का पत्रकारिता में 15 से ज्यादा वर्षों का अनुभव है. लाइव इंडिया से पहले जी न्यूज़, सहारा और इंडिया टीवी में काम का अनुभव है. लेकिन यह अनुभव किस काम का? टीवी पत्रकारिता का सबसे काला अध्याय सुधीर चौधरी के कंधे पर चढ़कर प्रकाश कुमार ने लिखा. अफ़सोस की बात है कि पत्रकारिता के तीनों रावण आज भी जिंदा हैं. लाइव इंडिया चल रहा है और उसी सुधीर चौधरी के नेतृत्व में चल रहा है. फर्जी स्टिंग ऑपरेशन को अंजाम देने वाला प्रकाश सिंह न्यूज़ इंडस्ट्री में अब भी काम कर रहा है. (अब नयी खबर आई है कि किसी केन्द्रीय नेता का वह मीडिया कॉर्डिनेटर बन गया है.). सबसे अफसोसजनक बात तो ये है कि सुधीर चौधरी उस एनबीए के सदस्य हैं जो न्यूज़ चैनलों के कंटेंट की निगरानी रखती है. मतलब साफ़ है कि अपने अविवेक और टीआरपी की ललक में ऐसी पीत पत्रकारिता करने के बावजूद उमा खुराना का यह रावण न केवल जिंदा है बल्कि अपने जड़े भी तेजी से मजबूत कर रहा है. क्या किसी दशहरे इस रावण का भी दहन होगा ? (स्रोत – मीडिया मंत्र, प्रथम प्रवक्ता,नवभारत टाइम्स,NDTV24X7)                        


Tuesday, 26 October 2010

चैनलों के रावण को कौन जलाएगा?

अबकी बार स्टार न्यूज ने जब अपने दिल्ली ऑफिस कैंपस में ही रावण दहन किया और पेड पंडित ने जब इसे राष्ट्र निर्माण का हिस्सा बताया तो मेरे मन में अचानक से सवाल उठा- क्या कभी ऐसा समय आएगा कि स्टार न्यूज बाहर से,पैसे से खरीदकर रावण लाकर जलाने के बजाय,चैनल के भीतर के रावणों को हमारे सामने करे। हमसे पूछे कि बताइए कि अब जब हमने अपने चैनल के भीतर रावण दहन शुरु कर दिया है लेकिन अपने ही चैनल के भीतर कुछ रावण मौजूद हैं तो उसका क्या करें? पेड पंडित के हिसाब से, टीआरपी की जुबान बकनेवाले पंडित के हिसाब से अगर सोचें तो अगर स्टार न्यूज अपने चैनल के भीतर के रावणों का दहन कर पाता है तो यकीन मानिए कि इससे बड़ा राष्ट्र निर्माण शायद ही कभी हो सकेगा। ये अलग बात है कि राष्ट्र शब्द अपने आप में एक भटकानेवाली अवधारणा है जिसकी एक गली अंधराष्ट्रवाद,पाखंड और आगे चलकर कट्टरता में खुलती है जिसका परिचय भी खुद स्टार न्यूज नें आज दिया। फिर भी, अगर स्टार न्यूज रावण दहन को लेकर सीरियस है तो उसे इस बात की पहल तो जरुर करनी चाहिए कि वो अपने भीतर पल रहे उन रावणों की साइज छोटी करे जिनका कद घटने के बजाय और बढ़ता चला जा रहा है। बल्कि हम ये कहें कि सिर्फ स्टार न्यूज ही क्यों,चैनल इन्डस्ट्री में ऐसे कई रावण हैं,जिनके हर साल के दहन के बीच उनका कद और अधिक पहले से बड़ा,खतरनाक और समाज को तहस-नहस करनेवाला होता जाता है।

स्टार न्यूज ने जब अपनी ऑफिस में ही रावण दहन का कॉन्सेप्ट बनाया तो जाहिर है कि उसके दिमाग में सिर्फ औऱ सिर्फ बाकी दूसरे चैनलों को पटकनी देते हुए आगे निकलने की रही। लेकिन ऐसा सोचते हुए चैनल के दिमागदार लोग ये भूल जाते हैं कि घर में टेलीविजन के आगे अपने को झोंक चुकी ऑडिएंस इस बात को इस रुप में नहीं लेती। कोई भी ऑडिएंस हवा में चीजों और टेलीविजन को नहीं लेती। वो उसे एक कॉन्टेक्स्ट के साथ जोड़कर देखती है। मैंने भी यही किया। जब मैंने इस ड्रामे को देखना शुरु किया तो सोचने लगा कि क्या ऐसा करते हुए चैनल के आकाओं को कभी इस बात पर ध्यान गया होगा कि इसी चैनल में सायमा सहर के साथ कुछ दबंग( दीपक चौरसिया वाला दबंग नहीं जो बिहार में दबंग मुख्यमंत्री चुनने की सलाह दिए फिर रहे हैं) और मनचले चैनलकर्मियों ने क्या किया? अविनाश पांडे और गौतम शर्मा ने किस हद तक सायमा सहर को परेशान किया, किस तरह उनपर लगातार प्रेशर क्रिएट किया औऱ जब मामला बढ़ता गया,तब वीमेन कमीशन तक जाकर चैनल के सो कॉल्ड समझदार मीडियाकर्मियों ने सबकुछ मैनेज करने की कोशिश की,ये सब अब सार्वजनिक है। इसकी खबर एनबीटी और दि टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी ली है। क्या एक ऑडिएंस की निगाह में ये सारे लोग रावण नहीं हैं और दहन करते वक्त इनकी तस्वीर दिमाग में नहीं आती?

उम्मीद है कि बॉस लोग उस अक्लमंद प्रोड्यूसर की पीठ ठोक रहे होंगे और वो भी खुद फैल रहा होगा जिसने पिछली रात "लक्ष्मण का रावण वध" स्टोरी बनायी। मिथकों में जाएं तो राम ने रावण का वध किया था,लक्ष्मण ने नहीं। लेकिन चूंकि इस देश में सबसे ज्यादा दिमाग चैनल में काम कर रहे लोगों के पास हैं क्योंकि उनके पास करोड़ों रुपये की छतरी है इसलिए वो जो करें,सब सही है। चैनल ने लक्ष्मण बनाया क्रिकेट के वी वी एस लक्ष्मण को और रावण माना अस्ट्रेलिया को और उतार दिया एक झटके में क्रिकेट की पटरी पर। सारे के सारे फुटेज क्रिकेट के और वी वी एस लक्ष्मण की क्रिकेट गाथा। एक सीधा सवाल कि जिस अस्ट्रेलिया से भारत के संबंध सुधारने की लगातार कोशिशें जारी है, फॉरेन अफेयर्स दिन-रात जिसके पीछे लगा है,उसे आप रावण करार देते हैं और वो भी भारतीय छात्रों की हत्या करने के बजाय से नहीं बल्कि क्रिकेट में वी वी एस लक्ष्मण के प्रयास से हराने की वजह से। ऐसा लगातार दिखाकर चैनल या तो ये समझता है कि उससे ज्यादा देशभक्ति किसी और में नहीं या फिर ये मानकर चलता है कि अस्ट्रेलिया के लोगों को हिन्दी नहीं आती,चाहे जो दिखाओ। उसकी इस समझ के आगे कोई क्या कहे? लेकिन, चैनल की ऐसी ही स्टोरी से अगर अस्ट्रेलिया के लोगों के बीच नफरत पनपती है,संबंध बनने के बजाय और बदतर होते हैं तो फिर ये चैनल के अक्लमंद, देशभक्त प्रोड्यूसर उनके और उनके परिवारवालों के लिए मर्यादापुरुषोत्तम राम होगें या फिर असली रावण करार दिए जाएंगे,इस फैसले को लेकर कोई विकल्प नहीं बचता। रावण कुछ किलो के बारुदी पटाखों का नाम नहीं है,वो समाज के उस खौफनाक इरादों का नाम है जिसका होना ही समाज को मौत के उपर टिके होने जैसा है। क्या चैनल तैयार है,अपने भीतर के इस रावण के दहन के लिए?
2 अक्टूबर को दीपक चौरसिया ने बाइक पर लहराते हुए जॉन इब्राहिम के साथ बिना हेलमेट पहने इंटरव्यू लिया।..नीचे पट्टी आयी कि चैनल ने ऐसा करने की इजाजत ले रखी है। गौतमबुद्धनगर पुलिस स्टेशन ने हमारी शंका का समाधान करते हुए ये कहा भी कि हां ऐसी अनुमति मिल जाती है। लेकिन साथ में मेरी इस बात पर सहमति भी जतायी कि कल अगर बाकी के चैनल भी ऐसी ही अनुमति मांगने लगेंगे तो क्या स्थिति बनेगी? बात करनेवाले अधिकारी का कहना है- बात तो आपने बहुत सही पकड़ी है। क्या बाइक विपासा से सुंदर है का जबाब जानने के लिए देश का सो कॉल्ड सबसे सक्रिय टीवी पत्रकार के भीतर अगर ये बदमाशी घुस आती है और सैंकड़ों लोगों की जान खतरे में पड़ सकती है,जिस सड़क पर परसों ही एक बच्चे की मौत हो गयी, आप उस पत्रकार के भीतर के रावण का दहन कैसे करेंगे? इतना ही नहीं,इसके बाद भी जैसा कि कुछ पत्रकार साथियों ने फोन करके बताया कि दीपक चौरसिया बिहार में कर रहे अपने स्पेशल शो-कौन बनेगा मुख्यमंत्री में भी कुछ लोगों के साथ बाइक पर लहराते नजर आए।( मैंने इस शो के इस हिस्से को देखा नहीं इसलिए यकीन के साथ नहीं कह सकता) क्या चैनल को उस रावणी मानसिकता की पहचान है?
13 अगस्त 2010 को गुजरात के मेहसाना में एक शख्स आग लगाकर आत्महत्या कर लेता है जिसके पीछे एक मीडिया संस्थान के दो पत्रकारों पर आरोप है कि उसने उसे इस काम के लिए उकसाया। इस बाबत ठीक दस दिन बाद यानी 27 अगस्त को दिल्ली में ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एशोसिएशन की फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट आ जाती है। कुल दस पन्ने की रिपोर्ट में जो कि एक ही तरफ छपाई है, 4 पन्ने कवर,कंटेंट और सिग्नेचर के पन्ने हैं। सिर्फ 6 पन्ने पर केस स्टडी है,उसमें सारी बातें समेट दी जाती है और टीवी-9 के जो एक्यूज्ड पत्रकार है कमलेश रावल,उनसे फोन पर बात करने की अपार्चुनिटी का जिक्र भर है। इसी तरह की कुछ सतही बातें और फाइंडिंग्स हैं जिन्हें पढ़ते ही अंदाजा लग जाता है कि ये खानापूर्ति से ज्यादा कुछ भी नहीं है। इस रिपोर्ट के बाद हमें मेहसाना में आत्महत्या करनेवाले शख्स के बारे में मीडिया की तरफ से कोई जानकारी नहीं है। अगर ये मामला कोर्ट,पुलिस के अधीन है तो इसकी फॉलोअप स्टोरी हमें कहीं दिखाई नहीं दी। इस मामले को स्टार न्यूज के रावण के तहत देखना इसलिए जरुरी लगा क्योंकि जिस ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एशोसिएशन ने रिपोर्ट जारी की है, उसके अध्यक्ष स्टार न्यूज चैनल हेड के शाजी जमां है। उनकी नाक के नीचे अगर चैनल में जर्नलिज्म के अलावे बाकी सबकुछ हो रहा है,चलताउ तरीके से किसी की आत्महत्या की रिपोर्ट पेश की जा रही है और वही चैनल अगर मौज में आकर ऑफिस में रावण दहन कर रहा है तो ये पाखंड से कहीं ज्यादा घिनौनी हरकत नहीं तो और क्या है?

दशहरे के मौके पर लगभग सारे चैनल अपने-अपने तरीके से रावण की ब्रांड वैल्यू बेचने में लगे थे। खुद स्टार न्यूज 51 रावण का दहन दिखा रहा था तो न्यूज 24 अलग-अलग फील्ड और कुकर्मों के रावण की खोज कर रहा था। ऐसे ही वक्त दिमाग में आया कि क्या न्यूज चैनलों में रावण नहीं हैं और अगर हैं तो उसकी साइज दिनदुनी रात चौंगुनी बढ़ती ही क्यों चली जा रही है? क्या इस रावण पर अंकुश लगाना समाज की सबसे बड़ी चुनौती है या फिर समाज अभी इस लायक हुआ ही नहीं है कि वो इस पर लगाम कस सके। इसलिए जिस तरह चैनल ने अपने-अपने तरीके से रावण खोजे,सच बात तो ये है कि चैनल के भीतर उनके अपने-अपने रावण है। कहीं कोई रावण सैंकड़ों पत्रकारों का करियर लील जा रह रहा है तो कहीं कोई चैनल को आजाद नाम देकर उसके पत्रकारों को लाइन में लगाकार सैलरी बांटता है।..जरुरत है कि चैनलों पर रावण देखने के बजाय,चैनलों के रावण की शिनाख्त करें,सरेआम उन्हें हतोत्साहित करे। बेहतरा दशहरा यही होगा।

फिलहाल मैंने स्टार न्यूज के भीतर जो रावण पल रहें हैं,किसी शख्स से ज्यादा वो मानसिकता है,उस पर लिखा है। आप सब पहल करेंगे तो बाकी चैनलों के भी रावण हमारे सामने बेनकाब हो सकेंगे। कोशिश कीजिए, अच्छा रहेगा।

Wednesday, 9 June 2010

चैनल,जो कल कार्पोरेट मीडिया के खिलाफ नजर आए..


आजतक से लेकर एनडीटीवी,स्टार न्यूज,जी न्यूज,IBN7 सबके सब भोपाल गैस कांड में आए फैसले को लेकर खफा नजर आए। एक जमाने के बाद लगभग सभी चैनलों का सुर एक था जिसमें मझोले और छोटे कद के चैनल भी शामिल दिखे। बल्कि मझोले और छोटे चैनलों के सुर बड़े कार्पोरेट की शक्ल में दिखाई देनेवाले इन चैनलों से कहीं ज्यादा उंचे रहे। उनके लिए शायद ये साल की दूसरी बड़ी घटना रही होगी जहां कि अपने को पक्षधरता और सरोकार की पत्रकारिता से जुड़े होने जैसी साबित करने का मौका मिला। जिन चैनलों को अभी जुम्मा-जुम्मा कुछ ही महीने या साल आए हुए हुए हैं वो भी दम मारकर भोपाल गैसकांड से जुड़ी ऐसी फुटेज मुहैया करा रहे थे कि मानो ऐसी ही खबरें दिखाने और बताने के लिए ही उग आए हों। दूसरी तरफ बड़े चैनल जो कि भोपाल गैसकांड को करगिल और 26/11 की तरह ही एक इवेंट माकर कुछ दिन पहले ही पैकेज तैयार कर लिया था और उसके लगातार प्रोमोज दिखाए जा रहे थे,उन्होंने अपनी कई दिनों की मेहनत को दरकिनार करते हुए कल के फैसले पर आकर टिक गए। संभव हो ऐसे में इन्होंने अपनी कुछ पहले से बनायी स्पेश स्टोरी गिरा दी हो और अगर चलायी भी हो तो फैसले पर बनी स्टोरी के बीच दबकर रह गयी हो।

कल अगर आपने शाम/रात तीन-चार घंटे तक न्यूज चैनल देखें होंगे तो आपको अंदाजा लग गया होगा कि कैसे एक-एक करके सारे चैनल भोपाल गैसकांड में आए फैसले को लेकर विरोध में चले गए। मैं अगर इसे एक जार्गन का सहारा लेते हुए कहूं कि कल लगभग सभी चैनलों में एस.पी.सिंह की आत्मा घुस गयी थी तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि चैनल किस हद तक पीड़ितों के पक्ष में थे। आजतक पर अभिसार शर्मा ने साफ तौर पर कहा कि वो आज न सिर्फ सियासी लोगों पर उंगली उठाएंगे,न सिर्फ प्रसासन पर,बल्कि आज वो पूरी की पूरी न्यापालिका और न्याय व्यवस्था पर उंगली उठाएंगे। जिन सियासी लोगों का मजमा लगाकर चैनल न्यायिक फैसले की रिप्लिका तैयार करती आयी है,अभिसार ने कहा कि वो आज की बहस में किसी भी सियासी शख्स को शामिल नहीं करेंगे औऱ सचमुच फैसला पूरा इंसाफ अधूरा नाम से स्पेशल स्टोरी में किसी भी सियासी शख्स को शामिल नहीं किया। बल्कि ये काम कमोवेश कई चैनलों ने किया। सीधे रवीन्द्र भवन भोपाल से एंकरिंग कर रही सिक्ता दवे( एनडीटीवी इंडिया) का गला बार-बार फंस जा रहा था। अगर ये एंकरिंग की शैली के तौर पर विकसित होती है तो जल्द ही अविश्वसनीय करार दे दी जाएगी लेकिन संवेदनशील नजरिए से इसे गला रुंध जाना या फिर भर आना कह सकते हैं। IBN7 पर समीर अब्बास बहुत ही गुस्से में नजर आए,ये न्याय के नाम पर भद्दा मजाक है। हां ये जरुर है कि स्टार न्यूज,जिसे कि भोपाल गैसकांड पर बनी स्टोरी के लिए इंडियन टेलीविजन एवार्ड मिला है,अभी भी सबसे ज्यादा असरदार लगी इसलिए उसने उसे ही प्रमुखता से दिखाया। चैनल पर ये सबकुछ तीन-चार घंटे तक ये सब लगातार चला जिसे देख-सुनकर हम भी भावुक हुए। हमारा टेलीविजन के प्रति नजरिया बदलता नजर आने लगा और तमाम विरोधों के वाबजूद जो मैं तर्क देता फिरता हूं कि अभी भी टेलिवीजन में भरपूर संभावनाएं हैं,ये हर समय गलत नहीं करता,इसके कारण एक हद तक लोकतंत्र बचा हुआ है,इन सब बातों को मजबूती मिली। लेकिन इतना सबकुछ होते हुए भी कुछ सवालों के साथ ही दिल्ली से एनडीटीवी इंडिया के लिए चैट पर मौजूद रघु राय (वही रघु राय जिनकी फोटोग्राफी से पूरी दुनिया ने इस भोपाल गैसकांड की हकीकत को समझा) की बाइट हमें परेशान करती है। हम इन दर्दनाक फुटेज और एस.पी.सिंह की घुस आयी आत्मा के प्रभाव में आकर काम कर रहे चैनलों के बारे में एक बार फिर से सोचना शुरु करते हैं।

मेरे दिमाग में कौन से सवाल उभरे इसके पहले रघु राय की बात को शामिल करना ज्यादा जरुरी है। रघु राय से सिक्ता ने कई तरह के सवाल किए जिसमें कि एक सवाल ये भी कि क्या आपका मन था कि आप भी आज भोपाल आते और पीड़ित लोगों के साथ न्यायालय में जाकर देखते कि क्या फैसला सुनाया जा रहा है? रघु राय ने जिन सारे सवालों के जबाब दिए उसमें एक ईमानदार सर्जक,कलाकार और पत्रकार की खनक और असहमति मौजूद थी। उन्हें इस बात को मजबूती से रखा कि हम पैनल डिशक्शन में आते हैं और समझिए कि कुछ नहीं करते,सिर पीट कर चले जाते हैं। कहीं कुछ नहीं होता। आप सोचिए न इस देश मे जो न्याय व्यवस्था है उसे देखकर तो लगता है कि गरीबों का कहीं कुछ होनेवाला ही नहीं है। सब जैसे-तैसे चल रहा है। हम इसे मेरा देश महान कहते हैं,देखिए आप हालात। सबकुछ ऐसा है कि लगता ही नहीं कि ये देश संभल पाएगा। रघु राय की बातों में एक ठोस निराशा जो कि शायद ही कभी पिघले बार-बार हमारे सामने चक्कर काट रही थी और वहीं से हमारे दिमाग में सवाल उठने शुरु हुए।----

सबसे पहला सवाल कि चैनलों ने इस फैसले के खिलाफ स्टैंड लिया क्या ये उसकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति का हिस्सा है? क्या वो ऐसे सारे मौके पर स्टैंड लेते आए हैं इसलिए इस मौके पर भी ऐसा ही किया? मेरे इस सवाल पर चैनल सहित इसके समर्थन में जुटे लोग एक लंबी-चौड़ी फेरिस्त हमारे हाथों में थमा सकते हैं और बड़ी आसानी से साबित कर सकते हैं कि हां,आप देखिए-पूरे सिलसिलेबार तरीके से जहां कहीं भी पीड़ितों और आम आदमी के प्रति अन्याय हुआ है,नाइंसाफी हुई है,हमने उसका विरोद किया है। संभव है कि उनका एक तर्क एक हद तक सच हो। लेकिन अगर ऐसा है तो फिर जो न्यायालय सैंकड़ों टीवी क्र्यू से घिरा है,उसे ये फैसला सुनाने में रत्तीभर की हिचक क्यों नहीं होती? वो क्यों ऐसे फैसले सुना जाती है औऱ सिर्फ सुनाती ही नहीं बल्कि सरकारी वकील अकड़ के साथ बाहर आकर बाइट भी दे जाते हैं कि जिन पर जो चार्ज लगाए गए हैं उसके हिसाब से सजा दी गयी है। अगर इन चैनलों ने लगातार इसी तरह के प्रतिरोध किए हैं तो कैसे ऐसे फैसले आ जाते हैं जिसे सुनकर पांच मिनट के भीतर पूरे भोपाल के लोगों के बीच गुस्से का लावा फूट पड़ता है? ये सवाल सिर्फ भोपाल गैसकांड के मामले में ही नहीं बनता है बल्कि उन तमाम मामलों में बनता है जहां न्यायपालिका या सरकार ऐसी नीतियों और फैसलों को सुनाती है जो कि आमलोगों के विरोध में जाते हैं,फिर भी बेपरवाह होकर उसे लागू कर दिया जाता है।

आप खुद भी सोचिए न कि जो चैनल सालभर तक चड्डी,चप्पल से लेकर दस-दस लाख की कार बेचनेवाली कंपनियों का विज्ञापन करती है,उन अंखुआयी हुई कंपनियों का हर चार के बाद एक बार उसका विज्ञापन करती है कि कल को ये घरेलू स्तर की कंपनी कार्पोरेट की शक्ल में तब्दील होगी तो उन्हें फायदा होगा,वही चैनल आज कैसे कार्पोरेट के खिलाफ खड़ी हो गयी? ये हममें से शायद ही किसी को स्वाभाविक लगे। इसका एक सिरा इस बात से भी जुड़ता है कि इस फैसले को लेकर आमलागों के बीच जो असंतोष और गुस्से का भड़कना था औऱ जो एक हद तक भड़का,चैनल ने उसका समर्थन करके,आमलोगों की भावनाओं के साथ अपनी आवाज शामिल करके सरकार को किसी न किसी रुप में राहत देने का काम किया। लोगों का सारा गुस्सा चैनल और पिक्चर ट्यूब के रास्त बहा ले जाने की कोशिश की। सरकार और न्यापालिका के प्रति जो घोर असहमति रही उसका फायदा चैनल ने उठाने की कोशिश की और इस विपरीत परिस्थिति में एक भरोसा कायम करने का जुगत भिड़ाया। तीन पहले के प्रोमो को देखकर जो हम समझ रहे थे कि इसे भी चैनल ने इवेंट बना दिया,फैसले पर जब इसने ये स्टोरी करनी शुरु की तो लगा कि ये रिद्म टूट गया लेकिन नहीं। ये रिद्म टूटा नहीं था,बल्कि थोड़ी देर के लिए स्टीमुलेट भर कर दिया गया था। इसे चैनल की स्टोरी एंगिल और भाषा के जरिए सबसे आसानी से समझ सकते हैं।

ये फैसला एक बड़ी खबर थी लेकिन चैनल इसे खबर के बजाय फीचर की ही शक्ल में दिखाते रहे। दो-चार लाइन फैसले पर बात हुई,कुछ फुटेज भर से काम चला लिया और बाकी वही का वही कंटेंट जो कि इवेंट के तौर पर दिखाया जाना तय था। खबर की भाषा में जो तल्खी होती है,जो ऑब्जेक्टिविटी होती है,वो लगभग गायब रही। ले देकर वही हायपर इमोशन का तड़का, एंकर के चेहरे पर वही बरगला ले जानेवाली भंगिमा। अधिकांश चैनलों ने फैसले की पेंच को लेकर कोई गंभीर रिसर्च वर्क नहीं किया। इसलिए ये सारी स्टोरी उपरी तौर पर पीड़ितों के पक्ष में दिखती नजर आने के वाबजूद भी सरोगेट तौर पर सरकार की सेफ्टी में काम करती है। फीचर के आगे खबर का असर कम कर दिया गया।

हम चैनल ने भोपाल गैस पीड़ितों के लिए चार-पांच घंटे तक जो किया उसके प्रति आभार प्रकट करते हैं लेकिन इतना साफ है कि नाइंसाफी के खिलाफ आवाज बुलंद करने की कोई डियूरेशन नहीं होती,कोई वैलिडिटी नहीं होती। ऐसा नहीं होता कि तीन घंटे तक उसके खिलाफ आवाज उठाए जाएं और फिर बाकी सबकुछ पहले की तरह चलता रहे। ये जंतर-मंतर पर धरने में भले ही होता है कि कुछ घंटे का प्रदर्शन फिर खामोशी। लेकिन उस खामोशी में भी आगे की रणनीति तय करने का विराम भर होता है। ग्यारह बजे नहीं कि सारे चैनल अपनी पुरानी रंगत में आ गए।

आजतक से एस.पी.सिंह की आत्मा गायब हो चुकी थी। अब वहां इस बात का हिसाब-किताब लगाया जा रहा था कि राखी सावंत को कैसे छोटा पर्दा ऐसा गेटअप देता है कि वो ग्लैमरस ही न दिखे। इंडिया टीवी पर दो हजार साल पुरानी भीम की कब्र खोदी जा रही थी। न्यूज 24 में अंजना कश्यप,सईद अंसारी कुछ बाबाओं के एफर्ट से भूत बुला रहे थे। एनडीटीवी इंडिया पुराने गीतों के कार्यक्रम में खो गया। देर रात होते-होते चैनल एक बार फिर टीम इंडियां के भीतर की कलह में डूब गए। जरुरी नहीं कि हर वक्त भोपाल गैसकांड की ही स्टोरी दिखायी जाए,करगिल में हुई गड़बड़ियों की स्टोरी स्क्रीन पर स्टिल कर दी जाए लेकिन सच्चाई है कि इंसाफ की लड़ाई घंटों में नहीं जीती जा सकती। जिन चैनलों को देखते हुए मेरे सहित देश की करोड़ों जनता ने आंसू बहाए,भावुक हुए,अपना समझा,वो चैनल ऐसी घटनाएं बार-बार न हो इसके लिए कितना और किस हद तक दबाब बनाए रखती है,असल सवाल ये है। पीड़ितों का दर्द उनसे सटकर पीटीसी करने से कम नहीं होता,लगातार उनके साथ खड़े होने से होता है जिसके लिए ये चैनल शायद ही अपने को तैयार कर पाए हैं। नहीं तो बाकी मीडिया रुटीन इंवेट का हिस्सा तो है ही।

Monday, 12 April 2010

जी मिचलाता है सानिया का, अब अचार की हुई दीवानी



..जो सानिया तीन महीने पहले तक शोएब की दीवानी थी,अब वो अचार की दीवानी हो गयी है। देशभर के लोग उन्हें अचार का डब्बा भेज रहे हैं। इस मामले में 25 साल का छुट्टन भावुक हो जाता है और कहता-आज मेरी अम्मा जिंदा होती तो मैं भी सानिया के लिए कटहल का अचार बनवाकर भिजवाता। मेरी मां कटहल का अचार जितना बेहतर बनाती है,सवाल ही नहीं है कि सानिया को पसंद न आए।..उसी क्रम में देशभर में अचार की बेहतर कंपनियों,दुकानों,किस्मों और तरीकों की शिनाख्त होगी। राजस्थान या मेरठ का कोई बंदा तभी अकड़कर इंडिया टीवी पर बाइट दे रहा होगा कि उसी के यहां से अचार गयी है जिसे कि सानिया ने चटकारे लेकर मीडिया के सामने टेस्ट किया।..कहानियों का अंत नहीं है,एक के बाद एक कहानी बनेगी।..लेकिन न्यूज चैनल के लिए सानिया मिर्जा हमेशा खबर रहेगी।

फेसबुक पर गिरीन्द्र ने मीडिया के लोगों खासकर न्यूज चैनलों से गुहार लगायी है कि अब वो सानिया मिर्जा को बख्श दें। अब निकाह तो हो गया,खुदा के वास्ते अब इनकी बातें करना छोड़ दें। गिरीन्द्र चैनलों को एक बार फिर उन मुद्दों की तरफ लौटने की अपील करते हैं जिसमें कि लोगों के कन्सर्न हैं। मुझे नहीं पता कि फेसबुक पर लिखी गिरीन्द्र की अपील न्यूज चैनलों से जुड़े कितने लोगों तक पहुंचेगी और अगर पहुंचेगी भी तो उसका असर उन पर होगा भी या नहीं? और अगर होगा भी तो वो इस स्थिति में होगें भी कि नहीं कि इसे मान लें। क्या न्यूज चैनल के लोगों का कलेजा इतना बड़ा है कि वो टीआरपी का लोभ छोड़कर एक आम ऑडिएंस की बात मान लें? मुझे तो रत्तीभर भी ऐसा नहीं लगता। बहरहाल मैं गिरीन्द्र को इस तरह की गुहार लगाते रहने की सलाह देने के वाबजूद घोषणा करता हूं कि सानिया मिर्जा की कहानी इतनी जल्दी टेलीविजन के पर्दे से नहीं उतरने वाली। मैंने कमेंट भी किया- अभी कहां गिरि,अभी तो मेंहदी और 15 तारीख की रिसेप्शन बाकी है। कुछ दिन तक मामला ठंडा पड़ भी जाए तो फिर ये खबर तो अभी से ही गदराने लगी है कि जी मचलता है सानिया का, अचार की आशिक हुई सानिया। कमेंट लिखने के बाद मैं तभी सोचने लगा कि आज से चार महीने बाद न्यूज चैनल सानिया मिर्जा को लेकर कौन सी स्टोरी बनाएंगे?

न्यूज चैनलों के लिए सानिया मिर्जा के संबंध और सगाई को लेकर दुनियाभर की अटकलों और फजीहतों का एक राउंड हो चुका है। शोएब के साथ शादी के बाद अब तक की जो स्थिति बनी है उस आधार पर इन चैनलों के भीतर इतनी समझदारी आ चुकी है कि वो ये मानने को तैयार हो जाएं कि दोनों के बीच के संबंध स्टेबल होंगे। अब किसी तरह का लोचा नहीं होगा और ये सो कॉल्ड एक आइडियल फैमिली का रुप लेगा। ऐसे में चैनल अब इस संबंध को और मजबूती देने में अपनी तरफ से दम-खम लगाएंगे।

दसवीं तक जिस किसी ने भी फिजीक्स की पढ़ाई की है उन्हें पता है कि उर्जा का कभी विनाश नहीं होता। टेलीविजन इसी फार्मूले पर काम करता है और इस क्रम में उसके लिए कुछ इमेज ऐसे हैं जो कि कभी नहीं मरेगें,कभी भी साइडलाइन में नहीं जाएंगे। वो इसी फीजिक्स के फार्मूले पर काम करते हैं। उनका स्टेटस भले ही बदल जाए लेकिन उनकी टीआरपी वैल्यू बनी रहेगी। वो टेलीविजन के कमाउ चरित्र है। कभी वो बाल बढ़ाकर चर्चा में रहेंगे तो कभी बाल झड़ने पर इलाज कराकर रहेंगे। कभी स्कर्ट पहनकर मेन न्यूज को खा जाएगी तो कभी लंहगे और लाल जोड़े में देशभर की खबरों को ढंक लेगी। सानिया मिर्जा की कैटगरी ऐसी ही है। ऐसे चरित्र अपने काम से आगे जाकर भी चर्चा में बने रहने की वजहों के साथ जुड़ जाते हैं। यकीन न हो तो मोटे तौर पर आप अंदाजा लगा ले कि सानिया मिर्जा जितना अपने खेल को लेकर चर्चा में नहीं रही उससे कहीं ज्यादा स्टेटमेंट,ड्रेसिंग सेंस,नथनी और अब तो माशाअल्लाह। ऐसे चरित्र जब एक बार चैनल को इस बात का एहसास करा जाते हैं कि उसकी हर बात बिकेगी,उसकी हर हरकत को देखा जाएगा। ऐसे में टेलीविजन का रवैया कैसा होगा,थोड़ा इसे प्रिडिक्ट कर लेना जरुरी होगा।

सानिया और शोएब के बीच के संबंधों को स्टेबल करने के लिए चैनल लफंदरगीरी छोड़कर थोड़ा सुधर जाएंगे। वो अब 'हमारे चैनल में इस तरह का चूतियापा नहीं होता है'के अंदाज में काम करेंगे। वो साफ कर देंगे कि सानिया शोएब के साथ उसी तरह खुश है जैसे एक सम्पन्न भारतीय परिवार में ब्याहने पर कोई लड़की खुश रहती है। शोएब सानिया की गोद में दुनियाभर की खुशियां लाकर उझल दे रहा है। जी हां,सही सुना आपने,दुनियाभर की खुशियां जिसमें उसकी मां बनने की भी चाहत शामिल है। सानिया जल्द ही खुशखबरी देगी। जल्द ही उसके आंगन में किलकारियां गूंजा करेगी। आदर्श पत्नी के तौर पर तो सानिया ने सोएब के साथ छ महीने गुजार दिए। अब वो हमारे सामने एक आदर्श मां के रुप में पेश आए इसके लिए सानिया को ढेर सारी शुभकामनाएं। जिस चैनल की जैसी औकात होगी,वैसी वो बाइट जुटाकर ला सकेंगे। कुछ पहुंचे निकले तो उस लेडी डॉक्टर तक जा सकते हैं जो सानिया को कन्सल्टेंसी दे रही होगी। सानिया होनेवाले बच्चे का क्या नाम रखेगी,उसकी शक्ल शोएब पर जाएगी या फिर एक सानिया जो पाकिस्तान की पैदाइश है इस पर स्पेशल स्टोरी बनेगी। ये क्रम चलता रहेगा। भावनाओं में जीनेवाली इंडियन ऑडिएंस इसे आंखे चीर-चीरकर तब भी देखेगी। जिस गजोधर,छुट्टन, पिंटुआ,बबलुआ,माधो ने सानिया के बियाह के दिन मातम में अनाज का एक दाना मुंह में नहीं लिया वो भी मन ही मन सानिया के बच्चे के लिए नाम सोचकर रखेगा। चैनल थोड़ा दिमाग लगाए तो एक शो करा सकता है- सानिया के बच्चे का कीजिए नामाकरण और सानिया की फैमिली के साथ सिंगापुर में बिताइए पूरे एक सप्ताह टाइप का इनाम घोषित कर सकता है।
इधर विज्ञापन की दुनिया भी सानिया की इस स्टेबल गृहस्थी से अपने को जोड़कर देखना शुरु कर देगी। पहले जो सानिया एडीडॉस बेचा करती थी,अब वो काजोल की ही तरह होम एप्लीएंन्सेज बेचा करेगी। सानिया फ्रीज से आम शर्बत निकालेगी तो शोएब उसी कंपनी के प्रेस बॉक्स से कपड़े प्रेस कर रहा होगा,पीछे से उसका बच्चा दाग लगे कपड़े को उसी कंपनी की वॉशिंग मशीन से झक-झक धोकर ले आएगा। इस तरह से विज्ञापनप्राप्त एक आदर्श न्यूक्लियर फैमिली बनेगी। वो भी काजोल की तरह टम्मी-मम्मी बोलकर सूप,सॉस,हेल्थ ड्रिंक बेचा करेगी जिसमें मां का प्यार बार-बार छलकरकर हम जिद्दी दर्शकों के बीच छलककर आएगा। कल तक जिस सानिया में अपनी गर्लफ्रैंड की छवि खोज रहे थे,अब पत्नी की खोजनी शुरु कर देंगे। मां की आंखों से आदर्श बहू के तौर पर तुलसी रिप्लेस हो जाएगी। अब सानिया जिस बच्चे को पोलियो ड्रॉप पिला रही होगी वो उसके अपने बच्चे होगे। लाइन इस तरह की होगी- मैं अपने बच्चे को सुरक्षित करती हूं,क्या आप नहीं? सानिया परिवार नियोजन करा रही होगी। विज्ञापन की लाइन होगी- जब मैं एक लड़की हूं तो एक से अधिक लड़की क्यों? शोएब को सरोगेट काम मिला करेगा। ये सबकुछ होगा। सानिया के बच्चे पाकिस्तान के स्कूल में पढेंगे और हिन्दुस्तान के मैंदान में फुटबॉल खेलेंगे,अमन की आशा का विज्ञापन करेंगे। सानिया के बाल पकने शुरु होंगे- वो लॉरिएल के कलर बेचा करेगी। सानिया थोड़ी कमजोर भी दिखेगी लेकिन इन्श्योरेंस पॉलिसी के विज्ञापन करेगी। लेकिन सानिया,सानिया न्यूज चैनल और टेलीविजन के लिए हमेशा खबर रहेगी,हमेशा एटेन्शन एलीमेंट रहेगी।

नोट- सानिया की शादी पर एक टेलीविजन शुभचिंतक की ओर से इसे बेहतर कामना और क्या हो सकती है? एक प्रति प्रिंटआउट रख लें तो हमारे चैनल के साथी स्क्रिप्ट लिखने से भी बच जाएंगे,कॉपीराइट तो है नहीं।